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पितृपक्ष 2026 तिथि लिस्ट: 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक सभी श्राद्ध

पितृपक्ष 2026 कब से है? 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक श्राद्ध की पूरी तिथि लिस्ट, वार और मुहूर्त सहित। मातृ नवमी, सर्वपितृ अमावस्या और गया वेदी कैलेंडर देखें।

पितृपक्ष 2026 की पूरी तिथि लिस्ट: 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक किस दिन कौन-सा श्राद्ध

अपडेट: 22 सितंबर 2026 • तिथि लिस्ट, मुहूर्त, श्राद्ध विधि और गया जी वेदी कैलेंडर सहित

पितृपक्ष 2026 को लेकर इस बार लोगों में काफी उलझन है। कोई 26 सितंबर से शुरुआत बता रहा है, कोई 27 से। किसी पंचांग में चतुर्थी-पंचमी एक दिन है, तो गया जी के पंचांग में अष्टमी-नवमी एक दिन। अगर आप भी सोच रहे हैं कि पितृपक्ष 2026 कब से है और अपने पूर्वज का श्राद्ध किस तारीख को करना है, तो यह लेख आपके लिए है।

इस गाइड में आपको एक ही जगह पर मिलेगा: पितृपक्ष 2026 की तारीख और वार के साथ पूरी श्राद्ध तिथि सूची, 26 और 27 सितंबर वाली उलझन का सीधा जवाब, गया जी में किस दिन किस वेदी पर पिंडदान होगा उसका अलग कैलेंडर, मृत्यु तिथि पता न हो तो क्या करें, और गया जाने वालों के लिए यात्रा की ज़रूरी जानकारी।

एक नज़र में: पितृपक्ष 2026
  • पहला श्राद्ध (पूर्णिमा): 26 सितंबर 2026, शनिवार
  • प्रतिपदा श्राद्ध: 27 सितंबर 2026, रविवार
  • मातृ नवमी: 4 अक्टूबर 2026, रविवार
  • सर्वपितृ अमावस्या (अंतिम दिन): 10 अक्टूबर 2026, शनिवार
  • गया जी पितृपक्ष मेला: 25 सितंबर से 10 अक्टूबर (त्रैपाक्षिक श्राद्ध 11 अक्टूबर तक)

पितृपक्ष 2026 कब से कब तक है?

हिंदू पंचांग के अनुसार पितृपक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलता है। इसे श्राद्ध पक्ष, महालय पक्ष या कनागत भी कहा जाता है। वर्ष 2026 में पितृपक्ष 26 सितंबर (शनिवार) को पूर्णिमा श्राद्ध से शुरू होगा और 10 अक्टूबर (शनिवार) को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।

द्रिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा तिथि 25 सितंबर की रात लगभग 11:06 बजे शुरू होकर 26 सितंबर की रात लगभग 10:18 बजे तक रहेगी। पूरे दिन पूर्णिमा रहने के कारण पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को ही किया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि पितृपक्ष 2026 शनिवार से शुरू होकर शनिवार को ही खत्म हो रहा है।

पितृपक्ष 2026 श्राद्ध तिथि लिस्ट (तारीख, वार और किसका श्राद्ध)

नियम सीधा है: पूर्वज का देहांत जिस तिथि को हुआ था (अंग्रेज़ी तारीख नहीं, हिंदू तिथि), पितृपक्ष में उसी तिथि वाले दिन उनका श्राद्ध किया जाता है। नीचे की टेबल देशभर में प्रचलित द्रिक पंचांग पर आधारित है।

तारीखवारश्राद्ध तिथिकिसके लिए
26 सितंबर 2026शनिवारपूर्णिमा श्राद्ध (ऋषि तर्पण)जिनका देहांत किसी भी मास की पूर्णिमा को हुआ
27 सितंबर 2026रविवारप्रतिपदा श्राद्धप्रतिपदा तिथि को दिवंगत; नाना-नानी का श्राद्ध भी इसी दिन करने की परंपरा
28 सितंबर 2026सोमवारद्वितीया श्राद्धद्वितीया तिथि को दिवंगत पूर्वज
29 सितंबर 2026मंगलवारतृतीया श्राद्धतृतीया तिथि को दिवंगत पूर्वज
30 सितंबर 2026बुधवारचतुर्थी और पंचमी श्राद्ध (एक साथ)चतुर्थी या पंचमी को दिवंगत; पंचमी पर अविवाहित दिवंगतों का श्राद्ध भी
1 अक्टूबर 2026गुरुवारषष्ठी श्राद्धषष्ठी तिथि को दिवंगत पूर्वज
2 अक्टूबर 2026शुक्रवारसप्तमी श्राद्धसप्तमी तिथि को दिवंगत पूर्वज
3 अक्टूबर 2026शनिवारअष्टमी श्राद्धअष्टमी तिथि को दिवंगत पूर्वज
4 अक्टूबर 2026रविवारनवमी श्राद्ध (मातृ नवमी)माता, दादी और सुहागिन दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध
5 अक्टूबर 2026सोमवारदशमी श्राद्धदशमी तिथि को दिवंगत पूर्वज
6 अक्टूबर 2026मंगलवारएकादशी श्राद्ध (इंदिरा एकादशी)एकादशी तिथि को दिवंगत पूर्वज
7 अक्टूबर 2026बुधवारद्वादशी और मघा श्राद्धद्वादशी को दिवंगत; संन्यासियों और साधुओं का श्राद्ध
8 अक्टूबर 2026गुरुवारत्रयोदशी श्राद्धत्रयोदशी को दिवंगत; कम उम्र में दिवंगत बच्चों का श्राद्ध
9 अक्टूबर 2026शुक्रवारचतुर्दशी श्राद्धदुर्घटना, हथियार या अन्य अकाल मृत्यु वाले पूर्वज
10 अक्टूबर 2026शनिवारसर्वपितृ अमावस्या (महालय अमावस्या)सभी ज्ञात-अज्ञात पितर; जिनकी मृत्यु तिथि पता नहीं
ध्यान दें: तिथियाँ सूर्योदय और स्थान के हिसाब से बदलती हैं, इसलिए अलग-अलग पंचांगों में एक-दो तिथियों का अंतर हो सकता है। श्राद्ध की अंतिम तारीख तय करने से पहले अपने कुल-पुरोहित या स्थानीय पंचांग से पुष्टि ज़रूर कर लें।

पितृपक्ष 2026: 26 सितंबर या 27 सितंबर? उलझन का सीधा जवाब

यह इस साल का सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है, और दोनों तारीखें अपनी जगह सही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कौन किस दिन को "शुरुआत" मान रहा है।

  • 26 सितंबर (पूर्णिमा श्राद्ध): इस दिन भाद्रपद पूर्णिमा है। पूर्णिमा को दिवंगत पूर्वजों का श्राद्ध और ऋषि तर्पण इसी दिन होता है। इसलिए ज़्यादातर पंचांग और गया जी में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से मानी जाती है।
  • 27 सितंबर (प्रतिपदा): शास्त्रों में आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या तक के 15 दिनों को ही मूल पितृपक्ष माना गया है। इसलिए कुछ जगह शुरुआत 27 सितंबर बताई जा रही है।

आपके लिए निष्कर्ष: अगर आपके पूर्वज का देहांत पूर्णिमा को हुआ था, तो 26 सितंबर को श्राद्ध करें। बाकी सबके लिए तिथि-वार श्राद्ध 27 सितंबर से शुरू होगा। गया जी जाने वाले यात्रियों के लिए 26 सितंबर का दिन खास है, क्योंकि गयाश्राद्ध की औपचारिक शुरुआत इसी दिन से मानी जाती है।

गया जी पितृपक्ष 2026: किस दिन किस वेदी पर पिंडदान

गया जी में पितृपक्ष का तरीका बाकी देश से अलग है। यहाँ सिर्फ तिथि नहीं, बल्कि हर दिन के लिए तय वेदियाँ (पिंडदान स्थल) होती हैं। पूरी विधि करने वाले श्रद्धालु रोज़ अलग-अलग वेदी पर पिंडदान करते हैं। गया के स्थानीय पंचांग के अनुसार इस बार अष्टमी और नवमी एक ही दिन (4 अक्टूबर) पड़ रही हैं, इसलिए सामान्य श्रद्धालुओं के लिए गया में पितृपक्ष 16 दिनों का रहेगा, जबकि त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वालों के लिए 17 दिनों का।

तारीखतिथि (गया पंचांग)मुख्य वेदियाँ और कर्मकांड
25 सितंबर, शुक्रवारअनंत चतुर्दशीपुनपुन नदी पर पिंडदान और गयापाल पुरोहित की पाँव पूजा; पुनपुन न जा सकें तो गोदावरी श्राद्ध
26 सितंबर, शनिवारपूर्णिमाफल्गु नदी में स्नान, श्राद्ध और पुरोहित पूजन से गयाश्राद्ध की शुरुआत
27 सितंबर, रविवारप्रतिपदाब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, रामशिला, रामकुंड और काकबली
28 सितंबर, सोमवारद्वितीयाउत्तर मानस, उदीची, कनखल, दक्षिण मानस और जिह्वालोल
29 सितंबर, मंगलवारतृतीयासरस्वती स्नान, पंचरत्न दान, मातंगवापी और धर्मारण्य
30 सितंबर, बुधवारचतुर्थीब्रह्मसरोवर, काकबली और तारक ब्रह्म दर्शन
1 अक्टूबर, गुरुवारपंचमीरुद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद पर पिंडदान
2 अक्टूबर, शुक्रवारषष्ठीकार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद और गार्हपत्याग्निपद
3 अक्टूबर, शनिवारसप्तमीसूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद सहित अन्य पद-वेदियाँ
4 अक्टूबर, रविवारअष्टमी और नवमीसीताकुंड में बालू से पिंडदान, रामगया श्राद्ध, दूध तर्पण और अन्नदान
5 अक्टूबर, सोमवारदशमीगयासिर और गयाकूप पर त्रिपिंडी श्राद्ध
6 अक्टूबर, मंगलवारएकादशीमुण्डपृष्ठा, आदि गदाधर और धौतपद
7 अक्टूबर, बुधवारद्वादशीभीमगया, गौ प्रचार और गदालोल
8 अक्टूबर, गुरुवारत्रयोदशीभगवान विष्णु का पंचामृत स्नान और फल्गु में दुग्ध तर्पण
9 अक्टूबर, शुक्रवारचतुर्दशीवैतरणी सरोवर पर गोदान और तर्पण
10 अक्टूबर, शनिवारअमावस्याअक्षयवट पर श्राद्ध, खीर से पिंडदान और पितृ विसर्जन
11 अक्टूबर, रविवारआश्विन शुक्ल प्रतिपदाकेवल त्रैपाक्षिक श्राद्ध: गायत्री घाट पर दही-चावल से पिंडदान और पितरों की विदाई
दोनों टेबलों में फर्क क्यों है? देशभर के द्रिक पंचांग में 30 सितंबर को चतुर्थी-पंचमी एक साथ है, जबकि गया के स्थानीय पंचांग में 4 अक्टूबर को अष्टमी-नवमी एक साथ है। यह सूर्योदय के समय और गणना पद्धति का अंतर है। घर पर श्राद्ध करने वाले अपने क्षेत्र के पंचांग को मानें। गया जी में पिंडदान करने वाले वहाँ के गयापाल पंडा जी के बताए क्रम का पालन करें।

गया में कितने दिन का पिंडदान करें?

हर कोई पूरे 17 दिन गया में नहीं रुक पाता। इसलिए ज़्यादातर श्रद्धालु 1 दिन, 3 दिन, 5 दिन, 7 दिन या 9 दिन का श्राद्ध करते हैं। एक दिन के पिंडदान में आम तौर पर फल्गु नदी, विष्णुपद और अक्षयवट पर विधि होती है। तीन दिन के श्राद्ध में प्रेतशिला और रामशिला जैसी वेदियाँ भी जुड़ जाती हैं। आप किस दिन पहुँचेंगे, उसके हिसाब से ऊपर की टेबल देखकर पंडा जी से क्रम पहले ही तय कर लें।

अपने पितर के श्राद्ध की सही तिथि कैसे चुनें

1. मृत्यु तिथि पता है

अगर आपको पूर्वज के देहांत की हिंदू तिथि पता है (जैसे आश्विन कृष्ण सप्तमी या माघ शुक्ल सप्तमी), तो पक्ष और महीना मायने नहीं रखता। सिर्फ तिथि देखें। सप्तमी को दिवंगत पूर्वज का श्राद्ध पितृपक्ष की सप्तमी, यानी 2 अक्टूबर को होगा।

2. सिर्फ अंग्रेज़ी तारीख पता है

अगर आपको केवल अंग्रेज़ी तारीख याद है, तो उस साल का पंचांग या कोई भरोसेमंद ऑनलाइन पंचांग खोलकर उस तारीख की तिथि देखें। सूर्योदय के समय जो तिथि थी, वही मानी जाती है। पुरोहित जी से भी यह आसानी से पता करवा सकते हैं।

3. मृत्यु तिथि बिल्कुल पता नहीं

ऐसे सभी पूर्वजों का श्राद्ध 10 अक्टूबर 2026, सर्वपितृ अमावस्या को करें। इस दिन ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के लिए तर्पण करने का विधान है। अगर किसी कारण से अपनी तिथि पर श्राद्ध छूट जाए, तब भी अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है।

4. विशेष परिस्थितियाँ

  • माता या सुहागिन महिलाएँ: मातृ नवमी (4 अक्टूबर) सबसे उत्तम मानी जाती है।
  • संन्यासी या साधु: द्वादशी (7 अक्टूबर)।
  • बाल्यावस्था में दिवंगत: त्रयोदशी (8 अक्टूबर)।
  • दुर्घटना या अकाल मृत्यु: चतुर्दशी (9 अक्टूबर)।
  • नाना-नानी (मातामह): कई परिवारों में प्रतिपदा (27 सितंबर) को श्राद्ध की परंपरा है।

पितृपक्ष 2026 की विशेष तिथियाँ और उनका महत्व

पूर्णिमा श्राद्ध (26 सितंबर): पितृपक्ष का पहला दिन, जिसमें ऋषियों को तर्पण भी किया जाता है। गया जी में इसी दिन से फल्गु स्नान के साथ गयाश्राद्ध शुरू होता है।

मातृ नवमी (4 अक्टूबर): इसे अविधवा नवमी भी कहते हैं। इस दिन परिवार की दिवंगत माताओं और सुहागिन महिलाओं का श्राद्ध किया जाता है। कई घरों में बहुएँ इस दिन विशेष पूजा करती हैं।

इंदिरा एकादशी (6 अक्टूबर): पितृपक्ष में पड़ने वाली यह एकादशी पितरों की मुक्ति के लिए विशेष मानी जाती है। कई लोग इस दिन व्रत रखकर उसका पुण्य पितरों को अर्पित करते हैं।

मघा श्राद्ध (7 अक्टूबर): जब पितृपक्ष में चंद्रमा मघा नक्षत्र में होता है, उस दिन किए गए श्राद्ध को विशेष फलदायी माना जाता है। इस साल यह द्वादशी के साथ पड़ रहा है।

सर्वपितृ अमावस्या (10 अक्टूबर): पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन। इस दिन सभी पितरों को विदा किया जाता है। गया जी में अक्षयवट पर खीर से पिंडदान और पितृ विसर्जन होता है। अगले दिन से शारदीय नवरात्रि का माहौल शुरू हो जाता है।

श्राद्ध का सही समय: कुतुप, रौहिण और अपराह्न मुहूर्त

सिर्फ सही तिथि चुनना काफी नहीं है, श्राद्ध का समय भी उतना ही मायने रखता है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध सुबह नहीं, बल्कि दिन के मध्य और उसके बाद वाले हिस्से में किया जाता है। मनुस्मृति में अपराह्न काल को पितृ कर्म के लिए सबसे उपयुक्त बताया गया है।

मुहूर्तलगभग समयक्या करें
कुतुप मुहूर्तलगभग 11:45 AM – 12:35 PMदिन का आठवाँ मुहूर्त; श्राद्ध आरंभ करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है
रौहिण मुहूर्तलगभग 12:35 PM – 1:25 PMकुतुप के तुरंत बाद; तर्पण और पिंडदान के लिए उत्तम
अपराह्न काललगभग 1:25 PM – 3:50 PMब्राह्मण भोजन, पंचबलि और दान का मुख्य समय
बहुत ज़रूरी: ये समय हर शहर के सूर्योदय और सूर्यास्त से तय होते हैं, इसलिए दिल्ली, मुंबई, पटना, कोलकाता और विदेश में रहने वालों के लिए घड़ी का समय अलग-अलग होगा। ऊपर दिया समय सिर्फ एक सामान्य अंदाज़ा है। अपने शहर का सही मुहूर्त उस दिन के पंचांग में देखें या पुरोहित जी से पूछें।

उदाहरण के लिए, 26 सितंबर 2026 के पूर्णिमा श्राद्ध के लिए प्रकाशित पंचांग में रौहिण मुहूर्त दोपहर लगभग 12:42 से 1:30 बजे तक और अपराह्न काल लगभग 1:30 से 3:55 बजे तक बताया गया है। आपके शहर में यह कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।

अगर मुहूर्त छूट जाए तो?

अगर किसी कारण से मुहूर्त निकल जाए, तो उसी तिथि के भीतर श्रद्धा और सादगी से किया गया श्राद्ध भी फलदायी माना जाता है। परंपरा में भाव को विधि से ऊपर रखा गया है। इसी तरह अगर पूरा कर्मकांड संभव न हो, तो पितरों के नाम पर अन्नदान भी पूर्ण श्राद्ध का फल देने वाला माना गया है।

घर पर तर्पण और श्राद्ध की सरल विधि

हर कोई गया, प्रयागराज या काशी नहीं जा सकता। घर पर भी श्रद्धा के साथ तर्पण और श्राद्ध किया जा सकता है। नीचे आम तौर पर अपनाई जाने वाली सरल विधि दी गई है। अपने कुल की परंपरा अलग हो, तो उसी का पालन करें।

ज़रूरी सामग्री

  • जल, दूध, काले तिल, जौ, कुश और अक्षत
  • तर्पण के लिए ताँबे या पीतल का पात्र और एक थाली
  • खीर या पितरों की पसंद का सात्विक भोजन, बिना लहसुन-प्याज का
  • पान का पत्ता, फूल, धूप-दीप और दक्षिणा
  • गाय, कौवे, कुत्ते, देव और चींटी के लिए भोजन के पाँच अंश (पंचबलि)

विधि: चरण दर चरण

  1. श्राद्ध वाले दिन सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें और दिनभर सात्विक रहें।
  2. दोपहर कुतुप मुहूर्त में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
  3. दाहिने कंधे पर जनेऊ की तरह कुश या वस्त्र रखकर, हाथ में जल, तिल और कुश लेकर अपने पितरों का नाम और गोत्र लेते हुए तर्पण करें।
  4. तर्पण का जल अंगूठे की ओर से, यानी पितृ तीर्थ से, अर्पित किया जाता है।
  5. भोजन तैयार होने पर पहले पंचबलि के पाँच अंश अलग निकालें।
  6. ब्राह्मण या किसी ज़रूरतमंद को श्रद्धा से भोजन कराएँ और वस्त्र व दक्षिणा दें।
  7. गाय और कौवे को भोजन का अंश अर्पित करें। मान्यता है कि कौवे के माध्यम से पितर भोजन ग्रहण करते हैं।
  8. अंत में हाथ जोड़कर पितरों से परिवार की सुख-शांति का आशीर्वाद माँगें और जाने-अनजाने हुई त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
सबसे सरल रास्ता: अगर पूरी विधि संभव न हो, तो हर दिन दोपहर में पितरों का स्मरण करते हुए एक लोटा जल में तिल डालकर अर्पित करें, एक दीपक जलाएँ और किसी भूखे को भोजन कराएँ। यह भी पूर्ण श्रद्धा का कर्म माना जाता है।

पितृ दोष: मान्यताएँ और पितृपक्ष में किए जाने वाले उपाय

ज्योतिष में माना जाता है कि पूर्वजों के प्रति कर्तव्य अधूरे रह जाने या श्राद्ध न होने से कुंडली में पितृ दोष बनता है। परंपरागत रूप से इसके संकेत इस तरह बताए जाते हैं: परिवार में बार-बार रुकावटें आना, संतान से जुड़ी परेशानी, घर में अशांति या बनते काम का बिगड़ना। ध्यान रहे, ये धार्मिक मान्यताएँ हैं, और किसी भी वास्तविक समस्या के लिए व्यावहारिक समाधान भी उतना ही ज़रूरी है।

पितृपक्ष को इन उपायों के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है:

  • सर्वपितृ अमावस्या (10 अक्टूबर) को सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करें।
  • पितृपक्ष में रोज़ाना जल में काले तिल डालकर पितरों को अर्पित करें।
  • गाय, कौवे और कुत्ते को भोजन कराएँ।
  • अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र या धन का दान करें, खासकर किसी ज़रूरतमंद परिवार को।
  • गया जी में पिंडदान को पितृ दोष से मुक्ति का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। इसी कारण हर साल यहाँ लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं।

पितृपक्ष के नियम: क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • श्राद्ध दोपहर के समय करें। शास्त्रों में कुतुप और रौहिण मुहूर्त (दिन का मध्य भाग) श्राद्ध के लिए सबसे उत्तम बताए गए हैं।
  • तर्पण में जल, काले तिल, कुश और जौ का प्रयोग करें।
  • श्राद्ध के बाद ब्राह्मण भोजन कराएँ और गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए भोजन का अंश (पंचबलि) निकालें।
  • सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान करें।
  • पूरे पक्ष में सात्विक भोजन और संयमित जीवन रखें।

क्या न करें

  • इन दिनों में गृह प्रवेश, सगाई, विवाह जैसे नए शुभ कार्य आम तौर पर नहीं किए जाते।
  • श्राद्ध के भोजन में लहसुन-प्याज और तामसिक चीज़ों से बचें।
  • श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को इस दौरान बाल-दाढ़ी कटवाने से बचने की परंपरा है।
  • घर आए किसी भी ज़रूरतमंद या पशु-पक्षी का अनादर न करें। मान्यता है कि पितर किसी भी रूप में आ सकते हैं।

ये नियम परंपरा और मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इनमें थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए अपने कुल की परंपरा को प्राथमिकता दें।

पितृपक्ष 2026 में गया जी जाने वालों के लिए ज़रूरी जानकारी

गया जी को पितृ तीर्थ और मोक्ष भूमि कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ भगवान विष्णु पितृ देवता के रूप में विराजमान हैं और यहाँ किया गया पिंडदान पितरों को मोक्ष देता है। इसी वजह से पितृपक्ष में देश-विदेश से लाखों लोग यहाँ पहुँचते हैं।

गया पितृपक्ष मेला 2026: प्रशासन की तैयारियाँ

  • मेला अवधि: पितृपक्ष मेला महासंगम 2026 का आयोजन 25 सितंबर से 10 अक्टूबर तक होगा।
  • टेंट सिटी: बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम करीब 2,500 बेड वाली टेंट सिटी तैयार करा रहा है।
  • ऐप और वेबसाइट: ज़िला प्रशासन ने "पिंडदान गयाजी" मोबाइल ऐप और वेबसाइट शुरू की है, जिस पर पिंडदान से जुड़ी जानकारी मिलेगी।
  • बहुभाषी मदद: पहली बार अलग-अलग राज्यों से आने वाले यात्रियों के लिए उनकी भाषा में "मे आई हेल्प यू" डेस्क की सुविधा दी जा रही है।

यात्रा की योजना कैसे बनाएँ

मेले के दौरान गया के होटल, धर्मशाला, ट्रेन और कैब, सब जल्दी भर जाते हैं। ज़्यादातर यात्री फ्लाइट से पटना आते हैं और वहाँ से सड़क या ट्रेन से करीब 2.5 से 3 घंटे में गया पहुँचते हैं। पूरी जानकारी के लिए हमारा लेख पटना एयरपोर्ट से गया कैसे जाएं: कैब, ट्रेन, बस और किराया ज़रूर पढ़ें।

अपनी श्राद्ध तिथि के हिसाब से गया पहुँचने का दिन तय करें। उदाहरण के लिए, अगर आप विष्णुपद पर पिंडदान करना चाहते हैं और गया पंचांग के अनुसार पंचमी (1 अक्टूबर) को वहाँ विधि है, तो 30 सितंबर की शाम तक गया पहुँच जाएँ। गया में वेदियाँ अलग-अलग जगहों पर हैं, और प्रेतशिला जैसी वेदी पर सीढ़ियाँ भी चढ़नी पड़ती हैं। इसलिए बुज़ुर्गों के साथ हों तो पूरे दिन के लिए लोकल कैब रखना सबसे सुविधाजनक रहता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

पितृपक्ष 2026 कब से शुरू है?

पितृपक्ष 2026 की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी। तिथि-वार श्राद्ध 27 सितंबर (प्रतिपदा) से शुरू होंगे।

पितृपक्ष 2026 कब खत्म होगा?

पितृपक्ष 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। गया में त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वाले 11 अक्टूबर तक पिंडदान करेंगे।

सर्वपितृ अमावस्या 2026 कब है?

सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि पता न हो, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है।

मातृ नवमी 2026 कब है?

मातृ नवमी 4 अक्टूबर 2026, रविवार को है। इस दिन दिवंगत माताओं और सुहागिन महिलाओं का श्राद्ध किया जाता है।

गया पितृपक्ष मेला 2026 कब से कब तक है?

गया जी में पितृपक्ष मेला 25 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। अष्टमी और नवमी एक दिन होने से सामान्य श्रद्धालुओं के लिए यह 16 दिनों का और त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वालों के लिए 17 दिनों का रहेगा।

श्राद्ध करने का सही समय क्या है?

श्राद्ध दोपहर में किया जाता है। कुतुप मुहूर्त (लगभग 11:45 से 12:35), रौहिण मुहूर्त (लगभग 12:35 से 1:25) और अपराह्न काल (लगभग 1:25 से 3:50) सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। सही समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखें।

घर पर तर्पण कैसे करें?

दोपहर में स्नान करके दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें, हाथ में जल, काले तिल और कुश लेकर पितरों का नाम और गोत्र लेते हुए जल अर्पित करें, फिर पंचबलि निकालकर ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ।

अगर अपनी तिथि पर श्राद्ध न कर पाएँ तो क्या करें?

किसी कारण से अपनी तिथि पर श्राद्ध न हो पाए, तो सर्वपितृ अमावस्या (10 अक्टूबर) को श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है।

क्या पितृपक्ष में नया सामान खरीद सकते हैं?

परंपरा के अनुसार इस अवधि में नए शुभ कार्य और बड़ी खरीदारी टाली जाती है। रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ें खरीदने में कोई मनाही नहीं मानी जाती। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार निर्णय लें।

निष्कर्ष

पितृपक्ष 2026 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा। अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि के अनुसार ऊपर दी गई श्राद्ध तिथि लिस्ट से सही दिन चुनें, और तिथि पता न हो तो सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करें। गया जी जाने वाले श्रद्धालु वहाँ के वेदी कैलेंडर के हिसाब से अपने पहुँचने का दिन तय करें और यात्रा व ठहरने का इंतज़ाम समय रहते कर लें।

श्रद्धा से किया गया छोटा-सा तर्पण भी पितरों तक पहुँचता है। इस लेख को अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ शेयर करें, ताकि किसी की श्राद्ध तिथि न छूटे।

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अस्वीकरण: इस लेख की तिथियाँ द्रिक पंचांग और गया के स्थानीय पंचांग पर आधारित प्रकाशित जानकारी से ली गई हैं। धार्मिक विधि और तिथि के अंतिम निर्णय के लिए अपने पुरोहित से सलाह लें।

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